नवरात्री महत्त्व और पूजा विधि – Navratri Puja Vidhi in Hindi

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नवरात्री / Navratri देवी दुर्गा को समर्पित एक त्यौहार है। संस्कृत में नवरात्री शब्द का अर्थ “नौ रात” से है, जिसमे नौ का अर्थ नऊ और रात्रि का अर्थ रात से है। इन नौ रात और दस दीन में, 9 अलग-अलग देविओ की पूजा की जाती है। दसवे दिन को साधारणतः विजयादशमी और दशहरा के रूप में मनाया जाता है। भारत और नेपाल में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक नवरात्री है। साथ ही दिवाली प्रकाश और उत्साह का एक त्यौहार है जो दशहरा के 20 दिन बाद मनाया जाता है। देखा जाए तो एक साल में 5 तरह की नवरात्रियाँ आती है, जिनमे से शरद नवरात्री सबसे प्रसिद्ध है। ज्यादातर जगहों पर नवरात्री शब्द का अर्थ शरद नवरात्री से ही होता है।

नवरात्री महत्त्व और पूजा विधि / Navratri Puja Vidhi in Hindi
Navratri

नवरात्री के रीतिरिवाज और रस्मे –

मुख्य नवरात्री, सितम्बर-अक्टूबर महीने में मनायी जाती है, जिसमे लोग अपने घरो और मंदिरों में माँ दुर्गा की प्रतिमा को लगाते है। भक्त लोग माँ दुर्गा को फल और फुल चढाते है। इसके साथ-साथ लोग एकसाथ बैठकर उनकी याद में भजन भी गाते है।

नवरात्री के पहले तीन दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा की जाती है, जिन्हें उर्जा और शक्ति की देवी माना जाता है। नवरात्री के हर एक दिन को माँ दुर्गा के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन उनके कुमारी, पार्वती और काली रूप की पूजा की जाती है।

नवरात्री के पहले दिन एक मिटटी के बर्तन में जौ के बीज भी बोए जाते है। बड़े होने पर उन्हें माँ दुर्गा का आशीर्वाद माना जाता है। और अंतिम दिन उनकी भी पूजा की जाती है।

नवरात्री के चौथे, पाँचवे और छठे दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिन्हें धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। इसके बाद पाँचवे दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है, इस दिन को ललिता पंचमी भी कहते है।

नवरात्री का सातवाँ दिन माँ सरस्वती को समर्पित है, उस दिन कला और ज्ञान की देवी की पूजा की जाती है और आठवे दिन यज्ञ भी किया जाता है।
नवरात्री का नौवा दिन इस त्यौहार का अंतिम दिन होता है, इस दिन को महानवमी भी कहते है। इस दिन कन्या पूजा की जाती है, जिसमे नौ छोटी कन्याओ की पूजा की जाती है। इन नौ कन्याओ में हर एक कन्या को माँ दुर्गा का एक रूप माना जाता है। इस दिन इन कन्याओ के पैरो को पानी से धोया जाता है और लोग बड़े आदर और सम्मान के साथ उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते है। इसके बाद उन कन्याओ को खाना खिलाया जाता है और भक्त लोग उन्हें नए वस्त्र और उपहार भी देते है।

नवरात्री के समय में रात में अक्सर लोग दांडिया और गरबा खेलते है, विशेषतः गुजरात में लोग इसे बड़ी धूम-धाम से मनाते है। गरबा आरती के पहले माँ दुर्गा के सम्मान में खेला जाता है, जबकि दांडिया आरती के बाद खेला जाता है।

सितम्बर-अक्टूबर के नवरात्री के समय, नवरात्री का दसवा दिन दशहरा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भक्त ‘सरस्वती पूजा’ करते है और माँ दुर्गा से मानसिक शांति की ज्ञान की कामना करते है। इस दिन लंका के असुर राजा रावण का पुतला भी जलाया जाता है।

नवरात्री की कहानी / Story Of Navratri –

बहुत समय पहले, जब राजा दूशिबागो शिकार करने गए तब एक शेर ने उन्हें मार दिया था। इसके बाद राजकुमार सुदर्शन को राजा बनाने की तैयारियाँ चल रही थी, लेकिन रानी लीलावती और रानी मनोरमा के पिता राजा वीरसेन और उज्जैन के राजा युधाजित, अपने पोतो के लिए राज गद्दी को हथियाना चाहते थे। इसके लिए वे दोनों एक दुसरे से लढते भी थे। एक बार युद्ध में राजा वीरसेन की मृत्यु हो गयी। इसके बाद मनोरमा भी राजकुमार सुदर्शन के साथ जंगल में भाग गयी। इसके बाद ऋषि भरद्वाज की कुटियाँ में वे रहने लगे थे।

इसके बाद विजयी राजा युधाजित ने अपने पोते सत्रुजित को अयोध्या में ताज पहनाया। इसके बाद राजा मनोरमा और अपने बेटे को तलाश में चले गये। ऋषि ने भी कहा था की वह उन लोगो को किसी के हवाले नही करता जो उनकी सुरक्षा में है। इसके बाद युधाजित काफी उत्तेजित और क्रोधित हो गये थे। उस समय राजा ऋषि की हत्या कर देना चाहते थे लेकिन फिर उनके मुख्यमंत्री ने उन्हें ऋषि के वाक्यों की सच्चाई के बारे में बताया। इसके बाद युधाजित वापिस अपने राज्य में चले गए।

भाग्य भी राजकुमार सुदर्शन की तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था। एक दिन तपस्वी का बेटा आया और उसने नपुंसक को उसके संस्कृत नाम क्लीबा से पुकारा। राजकुमार ने उनके संस्कृत नाम का पहला अक्षर ही सुना था इसलिए उन्होंने उस नाम को क्लीम नाम से दोहराया। इससे वह अक्षर और भी ज्यादा शक्तिशाली हो गया था। अब वह एक बिज अक्षर बन चूका था। राजकुमार कयी बार यह शब्द दोहराते रहते थे और इससे उनके मन को शांति भी मिलती थी।

बनारस के राजा के दूत एक बार ऋषि के आश्रम के पास से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने महान राजकुमार सुदर्शन को देखा, उन्होंने राजकुमार को बनारस के राजा की बेटी राजकुमारी सशिकला के बारे में बताया।

इसके बाद स्वयंवर के कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमे एक स्त्री अपने लिए अपने पसंदीदा जीवनसाथी का चुनाव करती है। एक बार इसमें सशिकला ने सुदर्शन का चुनाव किया था। इसके बाद उन्होंने उचित रीती रिवाजो से शादी कर ली। कार्यक्रम में उपस्थित राजा युधाजित उस समय यह देखकर बनारस के राजा से लढने लगे थे। तान्ही देविओ ने सुदर्शन और उनके ससुर जी की मदद की। तभी युधाजित ने देविओ का मजाक उड़ाना शुरू किया और देविओ ने मिलकर युधाजित की सेना को तहस-नहस कर दिया था।

तभी सुदर्शन, उनकी पत्नी और उनके ससुर जी ने देवी की काफी स्तुति की। देवी ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया और वसंत नवरात्री में उनकी पूजा-अर्चना करने का आदेश दिया। और बाद में सभी देवियाँ गायब हो गयी।

इस घटना के बाद राजकुमार सुदर्शन और सशिकला ऋषि भरद्वाज के आश्रम में वापिस आ गये। महान ऋषि ने भी उनको आशीर्वाद दिया और राजकुमार सुदर्शन को कोसला के राजा के रूप में ताज पहनाया। इसके बाद राजकुमार सुदर्शन और राजकुमारी सशिकला दोनों ही अपन राज्य में वसंत नवरात्री में बड़ी धूम-धाम से माँ दुर्गा की पूजा करते थे।

सुदर्शन के अनुसार श्री राम और लक्ष्मण भी शरद ऋतू में देवी माँ की पूजा करते थे और तभी उपहार स्वरुप सीता माँ वापिस आयी थी।

क्रीत्तिबस रामायण के अनुसार, राम ने देवी दुर्गा को रावण के साथ हो रहे युद्ध के दौरान बुलाया था। बसंत ऋतू के अंत में भी माँ दुर्गा की पूजा याचना की जाती है, युद्ध की संभावनाओ के कारण भगवान राम ने देवी को अस्तं महाविद्या के जरिए बुलाया था, जिसे हम अकाल बोधन के नाम से भी जानते है। लेकिन यह पूजा पारंपरिक दुर्गा पूजा से थोड़ी अलग होती है। इसीलिए इस समय होने वाली दुर्गा पूजा को भी अकाल बोधन कहते है, जिसे हम बिना मौसम के की जानी वाली पूजा भी कहते है।

नवरात्री आरती / Aarti For Navratri –

जय अम्बे गौरी मैया
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी, तुम को निस दिन ध्यावत, मैयाजी को निस दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी.
बोलो जय अम्बे गौरी ..
माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को, मैया टीको मृगमद को, उज्ज्वल से दो नैना चन्द्रवदन नीको
बोलो जय अम्बे गौरी ..
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर साजे, मैया रक्ताम्बर साजे, रक्त पुष्प गले माला कण्ठ हार साजे
बोलो जय अम्बे गौरी ..
केहरि वाहन राजत खड्ग कृपाण धारी, मैया खड्ग कृपाण धारी, सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी
बोलो जय अम्बे गौरी ..
कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती, मैया नासाग्रे मोती, कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति
बोलो जय अम्बे गौरी ..
शम्भु निशम्भु बिडारे महिषासुर धाती, मैया महिषासुर धाती, धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती
बोलो जय अम्बे गौरी ..
चण्ड मुण्ड शोणित बीज हरे, मैया शोणित बीज हरे, मधु कैटभ दोउ मारे सुर भय दूर करे
बोलो जय अम्बे गौरी ..
ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी, मैया तुम कमला रानी, आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी
बोलो जय अम्बे गौरी ..
चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों, मैया नृत्य करत भैरों, बाजत ताल मृदंग और बाजत डमरू
बोलो जय अम्बे गौरी ..
तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता, मैया तुम ही हो भर्ता, भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता
बोलो जय अम्बे गौरी ..
भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी, मैया वर मुद्रा धारी, मन वाँछित फल पावत देवता नर नारी
बोलो जय अम्बे गौरी ..
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती, मैया अगर कपूर बाती, श्रीमाल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती
बोलो जय अम्बे गौरी ..
माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे, मैया जो कोई नर गावे, कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे
बोलो जय अम्बे गौरी ..

नवरात्री गरबा डांस / navratri garba –

गुजरात में, गरबा अक्सर नवरात्री, शरद पूर्णिमा, बसंत पंचमी और होली के मौको पर खेला जाता है। इसके साथ-साथ नवरात्री की नौ रातो को माँ जगदंबा के सम्मान में फोक संगीत भी बजाया जाता है। नृत्य साधारणतः महिलाओ द्वारा ही किया जाता है लेकिन वर्तमान में पुरुष भी इसमें हिस्सा लेते है। डांस करने के लिए सभी लोग एक बड़ा सा घेरा या गोला बनाकर पहले खड़े रहते है। गरबा शब्द की उत्पत्ति के पीछे बहुत से कारण है। प्राचीन धारणाओ के अनुसार भगवान कृष्णा की भाभी उषा ने ही लास्य नृत्य को लोकप्रिय बनाया था, जिसे बाद में गरबा के नाम से जाना जाने लगा।

गरबा के साधारण प्रकार में, महिलाए गरबा के पॉट में लैंप रखकर उसे अपने सिर पर रखती है और गोले के आकार में घुमती है। घुमने के साथ-साथ वे गाना भी गाते है और तालियाँ भी बजाते रहते है। अक्सर यह नृत्य करते समय फोक वाद्य यंत्र बजाये जाते है। गरबा पॉट के अंदर सुपारी और चाँदी के सिक्के भरे जाते है और उसके उपर नारियल भी रखा जाता है, जो पवित्र कुम्भ का प्रतिनिधित्व करता है। गुजरात में नवरात्री के समय में, गरबा नृत्य रात में ही किया जाता है। डांस का आयोजन विविध समूह, क्लब और समितियाँ करती रहती है। गरबा वाली रात सभी सहभागी एक खुली जगह पर जमा होते है। जमा होने के बाद वे गोलाकार आकार में जमा होते है, गोले के बीच में अक्सर माँ दुर्गा की प्रतिमा रखी जाती है।

नृत्य की शुरुवात किसी धीमे संगीत से की जाती है।स और जैसे-जैसे नृत्य आगे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे लोगो में गरबा खेलने का उत्साह और भी ज्यादा बढ़ते चला जाता है। संगीत को भी बीच-बीच में बदला जाता है, और गरबा गीत लगाए जाते है। नवरात्री गरबा भारत में डांस का सबसे प्रसिद्ध प्रकार है, जिसे पुरुष और महिलाए दोनों एकसाथ करते है। बहुत से लोग पारंपरिक गुजरती पोषाक पहनकर भी गरबा नृत्य करते है। सौराष्ट्र वाले क्षेत्र में सहभागी घाघरा-चोली के साथ ओढनी पहनते है। इसके साथ ही वे अपने आप को खुबसूरत और सुंदर आभूषणो से सजाते है। वहाँ पर पुरुष भी शर्ट और ट्राऊजर पहनते है। और इस तरह से पुरे भारतवर्ष में लोग नवरात्री के दिनों में बड़ी धूम-धाम से गरबे का आनंद लेते है।

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1 COMMENT

  1. apne desh me tyoharo ka badahi mahatva hain aur khas kar diwali aur dasahara jo navratri ke baad aata hain , navratri ki puja bade hi dil se karte hain aapki di huyi jankari jarur sabhi pasand aayengi.

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